Saturday, August 1, 2009

Poem

तन्हाई का आलम

सागर के लहरों से मैं ये कहेता हु '
मुझको अपने प्यार के गोद में सो जाने दो "
तेरे इस प्यार का रस जरा हमको भी चखने दो '
हमको भी अपनी आगोस में डूब जाने दो "
मात है खुशी से जिन्दगी है बे रुखी सी '
अब में किसको सुनाऊ अपनी ये दास्ता "
मौत के समन्दर में लाखो डूब जाते है '
और उस समन्दर ने मुझे प्यासा छोड़ दीया "
लहरों के उन दरखतों पर बैठा कर कहा चले गए '
हमें तो उन लहरों को झेलने की आदत सी हो गई है "
औरो को क्या कहू अपनों ने ही छोड़ देया है '
ये ही मेरी तन्हाई है ये ही मेरा आलम है "






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